कहतें हैं दलदल यहाँ कभी था ही नहीं
मखमली घास थी हर तरफ़
बच्चे ऊधम मचाते रहते थे हर पल
दिशायें फुदकती रहती थीं बच्चों के साथ
क्या पता किस ओर से पतंग उड़ चले
तब हील वाली चप्पलें नहीं थी हमारे पास
लकड़ी का चप्पल होता था तब
खड़ाऊ तो नहीं लेकिन उससे मिलता जुलता
टायर की पट्टी लगी होती थी मज़बूत पकड़ के लिए
फिर एक दिन जाना पड़ा सब छोड़ कर
जब लौटा तो सब वैसा नहीं था
अब दलदल थी हर तरफ़
अब लकड़ी की चप्पल यहाँ न बनती हैं न बिकती हैं
अब हील वाली चप्पल या रेन बूट पहनना होगा
लेकिन ये कौन बताएगा
ये दलदल कैसे बना ?
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