Sunday, January 20, 2019

 पतझड़ में गिरे पत्ते

चलो यूँ ही ख़ामोश 
के पतझड़ में गिरे पत्ते 
गहरी नींद में हैं 
लफ़्ज़ों का खज़ाना यूँ ही नहीं जमा किया मैंने 
गाँव के मचान पर
टूटे नाव की ओट में 
जो डूब गई थी कभी 
इश्तेहार तब आज की तरह नहीं था 
भोमा बजा बजा कर बैलगाड़ी से बटते थे इश्तेहार 
घर की कच्ची दीवारों पर
स्लेट वाली पेंसिल के निशान अब भी होंगे 
जुगनू लालटेन ढिबरी आज भी जलते होंगे 
सुना है बिजली के खम्भे गड़े थे 
तार भी था उन पर 
लेकिन बिजली एक बार आकर गई 
फिर नहीं आई 
अगर ये सब इत्तेफ़ाक़ है 
तो समेट लेना होगा उन यादों को 
क्यूंकि कौन सुनता है मेरी यहां
लोग कहते हैं 
मैं ख़ुद से बात करता हूँ....

-अशोक कुमार अनुराग 

No comments:

Post a Comment