पतझड़ में गिरे पत्ते
चलो यूँ ही ख़ामोश
के पतझड़ में गिरे पत्ते
गहरी नींद में हैं
लफ़्ज़ों का खज़ाना यूँ ही नहीं जमा किया मैंने
गाँव के मचान पर
टूटे नाव की ओट में
जो डूब गई थी कभी
इश्तेहार तब आज की तरह नहीं था
भोमा बजा बजा कर बैलगाड़ी से बटते थे इश्तेहार
घर की कच्ची दीवारों पर
स्लेट वाली पेंसिल के निशान अब भी होंगे
जुगनू लालटेन ढिबरी आज भी जलते होंगे
सुना है बिजली के खम्भे गड़े थे
तार भी था उन पर
लेकिन बिजली एक बार आकर गई
फिर नहीं आई
अगर ये सब इत्तेफ़ाक़ है
तो समेट लेना होगा उन यादों को
क्यूंकि कौन सुनता है मेरी यहां
लोग कहते हैं
मैं ख़ुद से बात करता हूँ....
-अशोक कुमार अनुराग
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