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Sunday, January 20, 2019

झूठ ही बोला



इंतज़ार करती आँखोंं के अपने अधूरे सपने दे गया

समझाने को बहुत कुछ था इसलिये ख़ामोशी दे गया

मेरे हर सवाल पर तुमने हर बार झूठ ही बोला

जिसकी निगेहबानी में रखा था मेरा सामान वही ले गया

अरसा गुज़रा अब मिल भी लो कुछ सुन भी लो,

देखते देखते अब तो मौसम का मिज़ाज भी बदल गया
- अशोक अनुराग