इंतज़ार करती आँखोंं के अपने अधूरे सपने दे गया
समझाने को बहुत कुछ था इसलिये ख़ामोशी दे गया
मेरे हर सवाल पर तुमने हर बार झूठ ही बोला
जिसकी निगेहबानी में रखा था मेरा सामान वही ले गया
अरसा गुज़रा अब मिल भी लो कुछ सुन भी लो,
देखते देखते अब तो मौसम का मिज़ाज भी बदल गया
- अशोक अनुराग
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