सागर मंथन
औरत को मार डालने का सुख असीम होता है
टुकड़ों में काट-काट कर
पीस कर, दबोच कर, नोच कर
घिस कर, छील कर
उससे भी ज्यादा सुख नसीब होता है
जब वो मरती है घुलकर
चुप रहकर
शांत दिखकर
उदासी ठेलकर...
प्रसव वेदना झेलकर...
तब माधव और घीसू हिसाब लगा रहे होते है आलू का...
प्रेमचंद की कहानी कफ़न के वो तो पात्र थे...
लेकिन हमारे ही आस पास हर दिन...
माधव और घीसू नई कहानी गढ़ रहे होते हैं...
लेकिन अब प्रेमचंद नहीं हैं...
अक्सर संभ्रांत लोगों की पार्टी में जब...
नशा अपने उत्कर्ष पर होता है...
तब भी...थरथराती है जमीन...
और आसमान भी ओढ़े रहता रहता है
शर्मसार घूंघट...
निचोड़े गए तन से बाहर आई औरत
फिर सिर्फ
एक औरत नहीं होती...
सागर मंथन करना होगा एक बार और....
करना ही होगा.....ये जानने के लिए...
कि सारा विष तो शिव पी गए...
फिर इतना ज़हर इंसानों में कहाँ से आया...
- अशोक कुमार अनुराग
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